Wednesday, 27 September 2017

द्रव्यों का साक्षात्कार

योगदर्शन 


वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्।।यो ० द ०/१७।। 

वितर्क, विचार, आनंद, अस्मिता रूप स्थितियों के अनुभव से सम्प्रज्ञात समाधि होती है। 

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्।।यो ० द ०/१७।। 

व्यास भाष्य - 'वितर्क' का अर्थ चित्त के आलम्बन में स्थूलभूत पृथ्वी आदि का  साक्षात्कार है।  'विचार ' का अर्थ चित्त के आलम्बन में  सूक्ष्मभूत अर्थात तन्मात्राओं  का साक्षात्कार है।  'आनन्द ' का अर्थ  ह्राद = सुख की अनुभूति अर्थात इन्द्रियों से साक्षात्कार से सुखः की अनुभूति।  'अस्मिता ' का अर्थ है  (चित्त के आलम्बन में) जीवात्मा  का साक्षात्कार। 

प्रथम अर्थात वितर्कानुगत समाधि में (स्थूलभूत, तन्मात्राएँ, इंद्रियों और जीवात्मा ) ये चारो विषय  (योगी के जिज्ञास्य ) रहते हैं।  (किन्तु स्थूलभूतों का ही साक्षात्कार होता है।  शेष  का सामान्य ज्ञान रहता है। ) इसको चतुष्ट्यानुगत कहा  जाता है। 
द्वितीय, वितर्क से रहित विचार की समाधि है। (इसमें तन्मात्राए , इन्द्रियॉ  और जीवात्मा जिज्ञास्य रहते है।  केवल  तन्मात्राओ का साक्षात्कार होता है।  शेष  दो का सामान्य ज्ञान रहता है। )
तृतीय विचार से रहित आनंद समाधि है।  (इसमें इसमें इन्द्रियां एयर जीवात्मा जिज्ञास्य होते हे किन्तु इन्द्रियों का ही साक्षात्कार होता है।  जीवात्मा का सामान्य ज्ञान रहता है। )
चतुर्थ आनंद से रहित अस्मिता समाधि है।  (इसमें जीवत्मा ही जिज्ञास्य रहता है  और  जीवात्मा का ही  साक्षात्कार होता है , भूतादि अन्य कोई पदार्थ जिज्ञास्य नहीं रहता) ये सब आलंबन रहित समाधियां है। 

जब योगी यम नियम का पालन करता हुआ योग मार्ग में आगे बढ़ता है। अभ्यास और और वैराग्य के द्वारा चित्त की पाँच  वृत्तियों को रोककर सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था तक पहुँचता है, तब उसको पंचमाहभूत, जीवात्मा, द्रव्यों का ज्ञान होता है।
इस सूत्र में सम्प्रज्ञात समाधि का स्वरूप बताया गया है। सम्प्रज्ञात समाधि ४ प्रकार की है।
वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि के आलम्बन स्थूल विषय होते है। जैसे कि पृथ्वी आदि पाँच महाभूत और उनसे  शरीरआदि। समाधि में जब शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनो संयुक्त रहते है , तब वह वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। इस स्थिति में जीवात्मा 'प्रमाता' के रूप में, इन्द्रियां 'प्रमाण' के रूप में और (जिस पर चित्त एकाग्र किया जाता है) 'प्रमेय' के रुप में स्थित रहता है। 
जब तन्मात्रों में अर्थात गन्धतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा,  स्पर्शतन्मात्रा, शब्दतन्मात्रा, जो पृथ्वी,  पाँच  महाभूतों के  कारण में चित्त को एकाग्र  जाता है, तो वह विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। इस अवस्था में जीवात्मा 'प्रमाता', चित्त 'प्रमाण' और तन्मात्रा 'प्रमेय' के रूप में रहते हैं। 
जब महत्त्व, अहंकार, मन और इन्द्रियों में चित्त की एकाग्रता की जाती है , तब वह आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि होती  है। इन की उतपत्ति में सत्वगुण प्रधान होने से इनके स्वरूप के अनुभवकाल में सुख की अनुभूति होती है। यहाँ  भी जीवात्मा 'प्रमाता', चित्त 'प्रमाण' और इन्द्रियाँ आदि 'प्रमेय' के रूप में हैं। 
जब जीवात्मा समस्त जड़ पदार्थो को और अपने स्वरूप को पृथक- पृथक जानकर अपने स्वरूप में चित्त को एकाग्र करता है तब वह अस्मितानुगत समाधि है। यद्यपि इस अवस्था में अहंकार, इन्द्रियाँ आदि सभी उपकरण जीवत्मा के साथ विधमान रहते हैं तथापि वः बुद्धि तथा ईश्वर की सहयता से अपने स्वरूप को जनता है। 

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